20 दिसंबर 2018 - 16:35
यमनः हुदैदा के इलाक़ों में संघर्षविराम मगर फिर भी हुई गोलाबारी की घटना, पहुंच रही है संयुक्त राष्ट्र की टीम

यमन के तटीय इलाक़े हुदैदा में संघर्ष विराम का तीसरा दिन गुज़रा। कुछ घटनाओं को छोड़कर शांति रही। कुछ घटनाएं तोपों से की जाने वाली गोलाबारी की हुईं लेकिन उसके अलावा शांति रही।

संयूक्त राष्ट्र संघ की एक टीम इस इलाक़े में पहुंच रही है जिसका काम यह सुनिश्चित करना होगा कि संघर्ष विराम जारी रहे और इसका उल्लंघन न हो।

संघर्ष विराम मंगलवार से शुरु हुआ है जिसके बाद से अलहुदैदा शहर में शांति देखी जा रही है। यह लाल सागर के तट पर स्थित महत्वपूर्ण शहर है यहीं से दसियों लाख यमनियों की ज़रूरत का सामान जाता है।

अलहुदैदा शहर के बाहर कुछ स्थानों पर सऊदी गठबंधन के एजेंट के रूप में काम करने वाले लड़ाकों के मोर्चे हैं और इन्हीं लड़ाकों के साथ बुधवार को छिटपुट झड़पें हुईं।

अलहुदैदा प्रांत के केन्द्रीय नगर अलहुदैदा में तो यह कहा जा सकता है कि शांति है लेकिन प्रांत के अन्य भागों में झड़पें हुई हैं।

स्वेडन में यमनी पक्षों की वार्ता में हुदैदा में संघर्ष विराम करने पर सहमति बनी थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गोटेरस बल दे रहे हैं कि हुदैदा में संयक्त राष्ट्र संघ की टीम को तैनात कर दिया जाना चाहिए जो संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटनाओं पर नज़र रखे।

स्वेडन में होने वाली वार्ता के नतीजे में जो समझौता हुआ है वह महत्वपूर्ण है लेकिन संघर्षरत पक्षों के बीच विश्वास का इतना अभाव है कि इस समझौते को लागू करने में बड़ी कठिनाइयां उत्पन्न होने की आशंका है। इसका कारण यह है कि यमन का एक पक्ष वह है जिसे सऊदी अरब और इमारात सपोर्ट कर रहे हैं बल्कि यह दोनों देशो कुछ यमनी गुटों को यमन के नहीं बल्कि अपने एजेंडे के लिए प्रयोग कर रहे हैं और यही सबसे गंभीर विषय है। इसी स्थिति के कारण संघर्ष विराम का समझौता लागू हो जाने के बाद भी यह आशंका बनी हुई है कि इसका फिर से उल्लंघन न शुरू हो जाए।

सऊदी अरब और इमारात इस कोशिश में हैं कि उन्होंने यमन के राजनैतिक मंच को अपनी पसंद के गुटों के माध्यम से हाईजैक करने की जो कोशिश की थी उसे किसी न किसी तरह सफल बना लें इसलिए कि दोनों ही देशों और विशेष रूप से सऊदी अरब ने यमन युद्ध पर बहुत पैस बर्बाद किया है और वह इस बात को पचा नहीं पा रहा है कि यमन में उसकी पूरी योजना फ़ेल हो चुकी है। इसका एक कारण यह भी है कि सऊदी अरब को सीरिया से भी ख़ाली हाथ ही लौटना पड़ा है। सीरिया के बारे में भी सऊदी अरब ने यही ख़्वाब देखा था अलबत्ता यह ख़्वाब देखने में तुर्की, इस्राईल, क़तर, इमारात, अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस सहित बहुत सी शक्तियां शामिल थीं लेकिन यह पूरा मंसूबा नाकाम हो गया।

अब यमन में भी सऊदी अरब और इमारात को नाकामी और निराशा ही हाथ लगी है तो यह उनके लिए बहुत दुखद विषय है।

सऊदी अरब ख़ुद को इस्लामी जगत और अरब जगत का मुखिया समझता है हालांकि यह सऊदी अरब की अपनी सोच है, इस्लामी जगत और अरब जगत में सऊदी अरब को मुखिया स्वीकार करने के लिए अन्य देश तैयार नहीं हैं।

दूसरी ओर सऊदी अरब को यह भी ग़लतफ़हमी है कि पश्चिमी एशिया के इलाक़े में वह सबसे शक्तिशाली और आधुनिक हथियारों से लैस सेना का मालिक है। इन्हीं विचारों के आधार पर सऊदी अरब ने यमन पर युद्ध थोप कर पूरे इलाक़े को कठोर संदेश देने की कोशिश की थी लेकिन कठोर संदेश देने के चक्कर में सऊदी अरब ने ख़ुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली